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gr 110 lines
| # | gor-kn | gor-hi | crit | gr | dr-mula | gr-iitk | iitk |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | 7.22p.4.4प्रक्षिप्तेषु चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥ | ||||||
| 2 | 7.22p.4.1aगताभ्यामथ विप्राभ्यां रावणो राक्षसाधिपः । | ||||||
| 3 | 7.22p.4.1bदशयोजनसाहस्रं प्रथमं स मरुत्पथम् ॥ १ ॥ | ||||||
| 4 | 7.22p.4.2aअत्यक्रामन्महातेजाः पुष्पकेण महाबलः । | ||||||
| 5 | 7.22p.4.2bयत्र तिष्ठन्ति संन्यस्ता हंसाः सर्वगुणान्विताः ॥ २ ॥ | ||||||
| 6 | 7.22p.4.3aअत ऊर्ध्वं द्वितीयं तु गत्वा चैष मरुत्पथम् । | ||||||
| 7 | 7.22p.4.3bदशयोजनसाहस्रं तद्धि वै परिगण्यते ॥ ३ ॥ | ||||||
| 8 | 7.22p.4.4aतत्र मेघाः स्थिताः सर्वे त्रिविधा नित्यसंश्रिताः । | ||||||
| 9 | 7.22p.4.4bआग्नेयाः पक्षजा ब्राह्मास्त्रिविधा इति संस्थिताः ॥ ४ ॥ | ||||||
| 10 | 7.22p.4.5aअथ गत्वा तृतीयं तु वायोः पन्थानमुत्तमम् । | ||||||
| 11 | 7.22p.4.5bनित्यं यत्र स्थिताः सिद्धाश्चारणाश्च मनस्विनः । | ||||||
| 12 | 7.22p.4.5cदशैव तु सहस्राणि योजनानां तथैव च ॥ ५ ॥ | ||||||
| 13 | 7.22p.4.6aचतुर्थ वायुमार्गं तु गतवान्रावणस्तथा । | ||||||
| 14 | 7.22p.4.6bवसन्ति यत्र नित्यं वै भूताश्च सविनायकाः ॥ ६ ॥ | ||||||
| 15 | 7.22p.4.7aअथ गत्वा तु वै शीघ्रं पञ्चमं वायुगोचरम् । | ||||||
| 16 | 7.22p.4.7bदशैव तु सहस्राणि योजनानां तथैव च ॥ ७ ॥ | ||||||
| 17 | 7.22p.4.8aगङ्गा यत्र सरिच्छ्रेष्टा नागाश्र कुमुदादयः । | ||||||
| 18 | 7.22p.4.8bकुञ्जरा यत्र तिष्ठन्ति ये च मुञ्चन्ति शीकरान् । | ||||||
| 19 | 7.22p.4.8cगङ्गातोयेषु तिष्ठन्तः पुण्यं कुर्वन्ति सर्वशः ॥ ८ ॥ | ||||||
| 20 | 7.22p.4.9aततः करिकराद्भ्रंष्टं वायुना लोलितं भृशम् । | ||||||
| 21 | 7.22p.4.9bजलं कुञ्जेषु पतितं हिमं भवति राघव ॥ ९ ॥ | ||||||
| 22 | 7.22p.4.10aततो जगाम षष्ठं स वायुमार्ग महाद्युते । | ||||||
| 23 | 7.22p.4.10bयोजनानां सहस्राणि तथैव तु स राक्षसः । | ||||||
| 24 | 7.22p.4.10cयत्रास्ते गरुडो नित्यं ज्ञातिबांन्धवसत्कृतः ॥ १० ॥ | ||||||
| 25 | 7.22p.4.11aतथैव तु सहस्राणि योजनानां तथोपरि । | ||||||
| 26 | 7.22p.4.11bसप्तमं वायुमार्गं तु यत्र वै ऋषयः स्थिताः ॥ ११ ॥ | ||||||
| 27 | 7.22p.4.12aअत ऊर्ध्वं स गत्वाऽथ सहस्राणि दशैव तु । | ||||||
| 28 | 7.22p.4.12bअष्टमं वायुमार्गं तु यत्र गङ्गा प्रतिष्ठिता ॥ १२ ॥ | ||||||
| 29 | 7.22p.4.13aआकाशगङ्गा विख्याता ह्यादित्यपथमास्थिता । | ||||||
| 30 | 7.22p.4.13bवायुना धार्यमाणा सा महावेगा महास्वना ॥१३ ॥ | ||||||
| 31 | 7.22p.4.14अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि चन्द्रमा यत्र तिष्ठति ॥ १४ ॥ | ||||||
| 32 | 7.22p.4.15aअशीतिं तु सहस्राणि योजनानां तथोपरि । | ||||||
| 33 | 7.22p.4.15bचन्द्रमास्तिष्ठते यत्र ग्रहनक्षत्रसंयुतः ॥ १५ ॥ | ||||||
| 34 | 7.22p.4.16aशतं शतसहस्राणि रश्मयश्चन्द्रमण्डलात् । | ||||||
| 35 | 7.22p.4.16bप्रकाशयन्ति लोकांस्तु सर्वसत्वसुखावहाः ॥ १६ ॥ | ||||||
| 36 | 7.22p.4.17aततो दृष्ट्वा दशग्रीवं चन्द्रमा निर्दहन्निव । | ||||||
| 37 | 7.22p.4.17bस तु शीताग्निना शीघ्रं प्रादहद्रावणं तदा ॥ १७ ॥ | ||||||
| 38 | 7.22p.4.18aनासहंस्तस्य सचिवाः शीताग्निं भयपीडिताः । | ||||||
| 39 | 7.22p.4.18bरावणं जयशब्देन प्रहस्तो वाक्यमब्रवीत् ॥ १८ ॥ | ||||||
| 40 | 7.22p.4.19aराजञ्शीतन बाध्यामो निवर्ताम इतो वयम् । | ||||||
| 41 | 7.22p.4.19bचन्द्ररश्मिप्रतापेन रक्षसां भयमाविशत् ॥ १९ ॥ | ||||||
| 42 | 7.22p.4.20स्वभासा ह्येष राजेन्द्र शीतांशुर्दहनात्मकः ॥ २० ॥ | ||||||
| 43 | 7.22p.4.21aएतच्छ्रुत्वा प्रहस्तस्य रावणः क्रोधमूर्च्छितः । | ||||||
| 44 | 7.22p.4.21bविस्फार्य धनुरुद्यम्य नाराचैस्तं ह्यपीडयत् ॥ २१ ॥ | ||||||
| 45 | 7.22p.4.22aअथ ब्रह्मा समागम्य चन्द्रलोकं त्वरान्वितः । | ||||||
| 46 | 7.22p.4.22bदशग्रीव महाबाहो साक्षाद्विश्रवसः सुत । | ||||||
| 47 | 7.22p.4.22cगच्छ शीघ्रमितः सौम्य मा चन्द्रं पीडयाशुगैः ॥ २२ ॥ | ||||||
| 48 | 7.22p.4.23aलोकस्य हितकामोऽयं द्विजराजो महाद्युतिः । | ||||||
| 49 | 7.22p.4.23bमन्त्रं च ते प्रदास्यामि प्राणात्ययभयेऽभयम् ॥ २३ ॥ | ||||||
| 50 | 7.22p.4.24aयस्त्विमं संस्मरेन्मन्त्रं न स मृत्युमवाप्नुयात् । | ||||||
| 51 | 7.22p.4.24bएवमुक्तो दशग्रीवः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ २४ ॥ | ||||||
| 52 | 7.22p.4.25aयदि तुष्टोसि मे देव अनुग्राह्यो यदि ह्यहम् । | ||||||
| 53 | 7.22p.4.25bयदि मन्त्रेश्वरो देयो दीयतां मम धार्मिक ॥ २५ ॥ | ||||||
| 54 | 7.22p.4.26aयं जप्त्वाऽहं महाभाग सर्वदेवेषु निर्भयः । | ||||||
| 55 | 7.22p.4.26bअमरेषु च सर्वेषु दानवेषु पतत्रिषु । | ||||||
| 56 | 7.22p.4.26cत्वत्प्रसादात्तु देवेश न भयं विद्यते मम ॥ २६ ॥ | ||||||
| 57 | 7.22p.4.27aएवमुक्तो दशग्रीवं ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । | ||||||
| 58 | 7.22p.4.27bप्रणात्यये तु वै दद्मि न नित्यं राक्षसाधिप ॥ २७ ॥ | ||||||
| 59 | 7.22p.4.28aअक्षसूत्रं गृहीत्वा तु जपेन्मन्त्रमिमं शुभम् । | ||||||
| 60 | 7.22p.4.28bजप्त्वा तु राक्षसपते त्वमजेयो भविष्यसि । | ||||||
| 61 | 7.22p.4.28cअजप्त्वा राक्षसश्रेष्ठ न ते सिद्धिर्भविष्यति ॥ २८ ॥ | ||||||
| 62 | 7.22p.4.29aशृणु मन्त्रं प्रवक्ष्यामि येन राक्षसपुङ्गव । | ||||||
| 63 | 7.22p.4.29bमन्त्रस्य कीर्तनादेव प्राप्स्यसे समरे जयम् ॥ २९ ॥ | ||||||
| 64 | 7.22p.4.30aनमस्ते देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत । | ||||||
| 65 | 7.22p.4.30bभूतभव्यमहादेव हर पिङ्गललोचन ॥ ३० ॥ | ||||||
| 66 | 7.22p.4.31aबालस्त्वं वृद्धरूपी च वैयाघ्रवसनच्छद । | ||||||
| 67 | 7.22p.4.31bआरुणेयोसि देव त्वं त्रैलोक्यप्रभुरीश्वरः ॥ ३१ ॥ | ||||||
| 68 | 7.22p.4.32aहरो हरित नेमिस्त्वं युगान्तदहनोऽनलः । | ||||||
| 69 | 7.22p.4.32bगणेशो लोकशम्भुश्च लोकपालो महाभुजः ॥ ३२ ॥ | ||||||
| 70 | 7.22p.4.33aमहादेवो महाशूली महादंष्ट्रो महाभुजः । | ||||||
| 71 | 7.22p.4.33bकालश्च कालरूपी च नीलग्रीवो महोदरः ॥ ३३ ॥ | ||||||
| 72 | 7.22p.4.34aवेदान्तगो वेदमयः पशूनांपतिरव्ययः । | ||||||
| 73 | 7.22p.4.34bशूलधृच्छूलकेतुश्च नेता गोप्ता हरिः शिवः ॥ ३४ ॥ | ||||||
| 74 | 7.22p.4.35aजटी मुण्डी शिखण्डी च लगुडी च महायशाः । | ||||||
| 75 | 7.22p.4.35bभूतेश्वरो गणाध्यक्षः सर्वात्मा सर्वभावनः ॥ ३५ ॥ | ||||||
| 76 | 7.22p.4.36aसर्वदः सर्वहारी च स्रष्टा च गुरुरव्ययः । | ||||||
| 77 | 7.22p.4.36bकमण्डलुथरो देवः पिनाकी धूर्जटिस्तथा ॥ ३६ ॥ | ||||||
| 78 | 7.22p.4.27aमाननीयोर्हणीयश्च ओंकारः सामवेदगः । | ||||||
| 79 | 7.22p.4.27bमृत्युश्च मृत्युदूतश्च पारियात्रश्च सूव्रतः ॥ २७ ॥ | ||||||
| 80 | 7.22p.4.38aब्रह्मचारी गृही योगी वीणापणवतूणवान् । | ||||||
| 81 | 7.22p.4.38bअमरो दर्शनीयश्च बालसूर्यनिभस्तथा ॥ ३८ ॥ | ||||||
| 82 | 7.22p.4.39aश्मशानचारी भगवानुमापतिररिन्दमः । | ||||||
| 83 | 7.22p.4.39bभगनेत्रः प्रहर्ता च पूषदन्तनिपातनः ॥ ३९ ॥ | ||||||
| 84 | 7.22p.4.40aज्वरहर्ता पाशहस्तः प्रलयः काल एव च । | ||||||
| 85 | 7.22p.4.40bउल्कामुखोऽग्निकेतुश्च मुनिर्दीप्तो विशांपतिः ॥ ४० ॥ | ||||||
| 86 | 7.22p.4.41aउन्मादमोहनकरः समर्थस्त्रिदशोत्तमः । | ||||||
| 87 | 7.22p.4.41bवामनो वामदेवश्च प्राग्दक्षिण्यश्च नामतः ॥ ४१ ॥ | ||||||
| 88 | 7.22p.4.42aभिक्षुश्च भिक्षुरूपी च त्रिजटी जटिलः स्वयम् । | ||||||
| 89 | 7.22p.4.42bचक्रहस्तः प्रतिष्टम्भी चमूनां स्तम्भनस्तथा ॥ ४२ ॥ | ||||||
| 90 | 7.22p.4.43aऋतुर्ऋतुकरः कालो मधुर्मधुरलोचनः । | ||||||
| 91 | 7.22p.4.43bवानस्पत्यः शीकरश्च नित्यमाश्रित पूजितः ॥ ४३ ॥ | ||||||
| 92 | 7.22p.4.44aजगद्धाता च कर्ता च पुरुषः शाश्वतो ह्यजः । | ||||||
| 93 | 7.22p.4.44bधर्माध्यक्षो विरूपाक्षस्त्रिवर्त्मा भूतभावनः ॥ ४४ ॥ | ||||||
| 94 | 7.22p.4.45aत्रिनेत्रो बहुनेत्रश्च सूर्यायुतसमप्रभः । | ||||||
| 95 | 7.22p.4.45bदेवदेवोभिदेवश्च चन्द्राङ्कितजटस्तथा ॥ ४५ ॥ | ||||||
| 96 | 7.22p.4.46aनर्तको लासकश्चैव पूर्णेन्दुसदृशाननः । | ||||||
| 97 | 7.22p.4.46bसुब्रह्मण्यः शरण्यश्च सर्वदेवमयस्तथा ॥ ४६ ॥ | ||||||
| 98 | 7.22p.4.47aसर्वभूतनिवासश्च सर्वबन्धविमोचकः । | ||||||
| 99 | 7.22p.4.47bमोहनो वञ्चकश्चैव सर्पधारी वरोत्तमः ॥ ४७ ॥ | ||||||
| 100 | 7.22p.4.48aपुष्पदन्तो विभागश्च मुख्यः सर्वहरस्तथा । | ||||||
| 101 | 7.22p.4.48bहरिश्मश्रुर्धनुर्धारी भीमो भीमपराक्रमः । | ||||||
| 102 | 7.22p.4.48cभक्ताभीष्टप्रदः स्थाणुः परमात्मा सनातनः ॥ ४८ ॥ | ||||||
| 103 | 7.22p.4.49aमया प्रोक्तमिदं पुण्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । | ||||||
| 104 | 7.22p.4.49b[ सर्वपापहरं पुण्यं शरण्यं शरणार्थिनाम् ] । | ||||||
| 105 | 7.22p.4.49cजप्यमेतद्दशग्रीव कुर्याच्छत्रुविनाशनम् ॥ ४९ ॥ | ||||||
| 106 | 7.22p.4.50aदत्त्वा तु रावणस्येदं वरं स कमलोद्भवः । | ||||||
| 107 | 7.22p.4.50bपुनरेव जगामाशु ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ ५० ॥ | ||||||
| 108 | 7.22p.4.51aरावणोपि वरं लब्ध्वा पुनरेवागमत्तदा । | ||||||
| 109 | 7.22p.4.51bनिवर्तमानः संहृष्टो रावणः स दुरात्मवान् । | ||||||
| 110 | 7.22p.4.51cअहे पथि नरेन्द्रर्षिदेवगन्धर्वकन्यकाः ॥ ५१ ॥ |