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gr 124 lines
| # | gor-kn | gor-hi | crit | gr | dr-mula | gr-iitk | iitk |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | 7.22p.3.3प्रक्षिप्तेषु तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥ | ||||||
| 2 | 7.22p.3.1aअथ संचिन्त्य पौलस्त्यः सोमलोकं जगाम ह । | ||||||
| 3 | 7.22p.3.1bमेरुशृङ्गे वरे रम्ये रजनीमुष्य वीर्यवान् ॥ १ ॥ | ||||||
| 4 | 7.22p.3.2aतदा कश्चिद्रथारूढो दिव्यस्रगनुलेपनः । | ||||||
| 5 | 7.22p.3.2bअप्सरोगणमुख्येन सेव्यमानस्तु गच्छति ॥ २ ॥ | ||||||
| 6 | 7.22p.3.3aरतिश्रान्तो सरोङ्गेषु चुम्बितः सन्विबुध्यते । | ||||||
| 7 | 7.22p.3.3bरावणस्त्वथ तं दृष्ट्वा कौतूहलसमन्वितः ॥ ३ ॥ | ||||||
| 8 | 7.22p.3.4aअथापश्यदृषिं तत्र पर्वतं मुनिसत्तमम् । | ||||||
| 9 | 7.22p.3.4bदशग्रीवो महात्मानं दृष्ट्वा चेदमुवाच ह । | ||||||
| 10 | 7.22p.3.4cस्वागतं तव देवर्षे दिष्ट्या चैवागतो ह्यसि ॥ ४ ॥ | ||||||
| 11 | 7.22p.3.5aकोयं स्यन्दनमारूढो ह्यप्सरोगणसेवितः । | ||||||
| 12 | 7.22p.3.5bनिर्लज्ज इव संयाति भयस्थानं न विन्दति ॥ ५ ॥ | ||||||
| 13 | 7.22p.3.6aरावणेनैवमुक्तस्तु पर्वतो वाक्यमब्रवीत् । | ||||||
| 14 | 7.22p.3.6bशृणु वत्स यथातत्त्वं वक्ष्ये तव महामते ॥ ६ ॥ | ||||||
| 15 | 7.22p.3.7aएतेन निर्जिता लोका ब्रह्मा चैवाभितोषितः । | ||||||
| 16 | 7.22p.3.7bएष गच्छति मोक्षाय सुसुखं स्थानमुत्तमम् ॥ ७ ॥ | ||||||
| 17 | 7.22p.3.8aतपसा निर्जिता लोका विक्रमेण यथा त्वया । | ||||||
| 18 | 7.22p.3.8bप्रयाति पुण्यवान्वत्स सोमं पीत्वा न संशयः ॥ ८ ॥ | ||||||
| 19 | 7.22p.3.9aत्वं च राक्षसशार्दूल शूरः सत्यव्रतस्तथा । | ||||||
| 20 | 7.22p.3.9bनेदृशेषु च क्रुध्यन्ति बलिनो ब्रह्मचारिषु ॥ ९ ॥ | ||||||
| 21 | 7.22p.3.10aअथापश्यद्रथवरं महाकायं महौजसम् । | ||||||
| 22 | 7.22p.3.10bजाज्वल्यमानं वपुषा गीतवादित्रसंकुलम् ॥ १० ॥ | ||||||
| 23 | 7.22p.3.11aक्वैष गच्छति देवर्षे शोभमानो महाद्युतिः । | ||||||
| 24 | 7.22p.3.11bकिन्नरैश्च प्रगायद्भिर्नृत्यद्भिश्च मनोहरम् ॥ ११ ॥ | ||||||
| 25 | 7.22p.3.12aश्रुत्वा चैनमुवाचाथ पर्वतो मुनिसत्तमः । | ||||||
| 26 | 7.22p.3.12bएष शूरो रणे योद्धा संग्रामेष्वनिवर्तकः । | ||||||
| 27 | 7.22p.3.12cयुध्यमानस्तथैवैष प्रहारैर्जर्जरीकृतः ॥ १२ ॥ | ||||||
| 28 | 7.22p.3.13aकृती शूरो रणे जेता स्वाम्यर्थे त्यक्तजीवितः । | ||||||
| 29 | 7.22p.3.13bसंग्रामे निहतो वीरान्हत्वा च सबलान्बहून् ॥ १३ ॥ | ||||||
| 30 | 7.22p.3.14aइन्द्रस्यातिथिरेवैष ह्यथवा यत्र चेच्छति । | ||||||
| 31 | 7.22p.3.14bनृत्तगीतविलासैस्तु सेव्यते नरसत्तमः ॥ १४ ॥ | ||||||
| 32 | 7.22p.3.15aपप्रच्छ रावणो भूयः कोयं यात्यर्कसन्निभः । | ||||||
| 33 | 7.22p.3.15bरावणस्य वचः श्रुत्वा पर्वतो वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥ | ||||||
| 34 | 7.22p.3.16aय एष दृश्यते राजन्विमाने सर्वकाञ्चने । | ||||||
| 35 | 7.22p.3.16bअप्सरोगणसंयुक्ते पूर्णेन्दुसदृशाननः ॥ १६ ॥ | ||||||
| 36 | 7.22p.3.17aसुवर्णदो महाराज विचित्राभरणाम्बरः । | ||||||
| 37 | 7.22p.3.17bएष गच्छति शीघ्रेण यानेन सुमहाद्युतिः ॥ १७ ॥ | ||||||
| 38 | 7.22p.3.18aपर्वतस्य वचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् । | ||||||
| 39 | 7.22p.3.18bय एते यान्ति राजानो ब्रूहि तानृषिसत्तम ॥ १८ ॥ | ||||||
| 40 | 7.22p.3.19aकोत्र मे याचतो दद्यायुद्धातिथ्यं महाद्युतिः । | ||||||
| 41 | 7.22p.3.19bक्षिप्रमाख्याहि धर्मज्ञ पिता मे त्वं हि पर्वत ॥ १९ ॥ | ||||||
| 42 | 7.22p.3.20aएवमुक्तः प्रत्युवाच रावणं पर्वतस्तदा । | ||||||
| 43 | 7.22p.3.20bस्वर्गार्थिनो महाराज नैते युद्धार्थिनो नृपाः ॥ २० ॥ | ||||||
| 44 | 7.22p.3.21aवक्ष्यामि च महाराज विचित्राभरणाम्बरः । | ||||||
| 45 | 7.22p.3.21bयस्तु राजा महातेजाः सप्तद्वीपेश्वरो महान् । | ||||||
| 46 | 7.22p.3.21cमान्धातेत्यभिविख्यातः स ते युद्धं प्रदास्यति ॥ २१ ॥ | ||||||
| 47 | 7.22p.3.22aपर्वतस्य वचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् । | ||||||
| 48 | 7.22p.3.22bकुत्रासौ वर्तते राजा तं ममाचक्ष्व तत्वतः ॥ २२ ॥ | ||||||
| 49 | 7.22p.3.23aअहं यास्यामि तत्राद्य यत्रासौ नरपुङ्गवः । | ||||||
| 50 | 7.22p.3.23bरावणस्य वचः श्रुत्वा मुनिर्वचनमब्रवीत् ॥ २३ ॥ | ||||||
| 51 | 7.22p.3.24aयुवनाश्वसुतो ह्येप मान्धाता राजसत्तमः । | ||||||
| 52 | 7.22p.3.24bसप्तद्वीपान्समुद्रान्ताञ्जित्वाऽद्य स्वर्गमेष्यति ॥ २४ ॥ | ||||||
| 53 | 7.22p.3.25aअथापश्यन्महाबाहुर्विरिञ्चिवरदर्पितः । | ||||||
| 54 | 7.22p.3.25bअयोध्याधिपतिं वीरं मान्धातारं नृपोत्तमम् ॥ २५ ॥ | ||||||
| 55 | 7.22p.3.26aसप्तद्वीपाधिपं यान्तं स्यन्दनेन विराजितम् । | ||||||
| 56 | 7.22p.3.26bकाञ्चनेन विचित्रेण महाहारेण भास्वता ॥ २६ ॥ | ||||||
| 57 | 7.22p.3.27aजाज्वल्यमानं रूपेण दिव्यस्त्रगनुलेपनम् । | ||||||
| 58 | 7.22p.3.27bतमुवाच दशग्रीवो युद्धं मे दीयतामिति ॥ २७ ॥ | ||||||
| 59 | 7.22p.3.28aएवमुक्तो दशग्रीवं प्रहस्येदमुवाच ह । | ||||||
| 60 | 7.22p.3.28bयदि ते जीवितं नेष्टं ततो युध्यस्व मामिति ॥ २८ ॥ | ||||||
| 61 | 7.22p.3.29aमान्धातुर्वचनं श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् । | ||||||
| 62 | 7.22p.3.29bवरुणस्य कुबेरस्य यमस्यापि न विव्यथे । | ||||||
| 63 | 7.22p.3.29cकिमरे मानुषात्वत्तो रावणो भयमाविशेत् ॥ २९ ॥ | ||||||
| 64 | 7.22p.3.30aएवमुक्त्वा दशग्रीवः क्रोधात्तं प्रदहन्निव । | ||||||
| 65 | 7.22p.3.30bआज्ञापयामास तदा राक्षसान्युद्धदुर्मदान् ॥ ३० ॥ | ||||||
| 66 | 7.22p.3.31aअथ क्रुद्धास्तु सचिवा रावणस्य दुरात्मनः । | ||||||
| 67 | 7.22p.3.31bववृषुः शरवर्षाणि क्रूरा युद्धविशारदाः ॥ ३१ ॥ | ||||||
| 68 | 7.22p.3.32aअथ राज्ञा बलवता कैङ्कपत्रैरजिह्यगैः । | ||||||
| 69 | 7.22p.3.32bइषुभिस्ताडिताः सर्वे प्रहस्तशुकसारणाः । | ||||||
| 70 | 7.22p.3.32cमहोदरविरूपाक्षमारीचाकम्पनादयः ॥ ३२ ॥ | ||||||
| 71 | 7.22p.3.33aअथ प्रहस्तो नृपतिं शरवर्षैरवाकिरत् । | ||||||
| 72 | 7.22p.3.33bअप्राप्तानेव तान्सर्वान्प्रचिच्छेद नृपोत्तमः ॥ ३३ ॥ | ||||||
| 73 | 7.22p.3.34aभुशुण्डीभिश्च भल्लैश्च भिण्डिपालैश्च तोमरैः । | ||||||
| 74 | 7.22p.3.34bनरराजेन दह्यन्ते शलभा इव तेऽग्निना ॥ ३४ ॥ | ||||||
| 75 | 7.22p.3.35aपुनर्नृपवरः क्रुद्धः पञ्चभिः प्रविभेद तम् । | ||||||
| 76 | 7.22p.3.35bतोमरैः स महाघोरैः पुरा क्रौञ्चमिवाग्निजः ॥ ३५ ॥ | ||||||
| 77 | 7.22p.3.36aततो मुहुर्भ्रामयित्वा मुद्गरं वज्रसन्निभम् । | ||||||
| 78 | 7.22p.3.36bसुमोच सोतिवेगेन राक्षसस्य रथं प्रति ॥ ३६ ॥ | ||||||
| 79 | 7.22p.3.37aस पपात महावेगो मुद्गरो वज्रसन्निभः । | ||||||
| 80 | 7.22p.3.37bघूर्णितो रावणस्तेन पतितः शक्रकेतुवत् ॥ ३७ ॥ | ||||||
| 81 | 7.22p.3.38aतदा स नृपतिः प्रीतो हर्षोद्भूतबलो बभौ । | ||||||
| 82 | 7.22p.3.38bसकलेन्दुकरैः स्पृष्टं यथाम्बु लवणाम्भसः ॥ ३८ ॥ | ||||||
| 83 | 7.22p.3.39aततो रक्षोबलं सर्वं महाभूतमचेतनम् । | ||||||
| 84 | 7.22p.3.39bपरिवार्याथ तं तस्थौ राक्षसेन्द्रं समन्ततः ॥ ३९ ॥ | ||||||
| 85 | 7.22p.3.40aततश्विरात्समाश्वस्तो रावणो लोकरावणः । | ||||||
| 86 | 7.22p.3.40bमान्धातुः पीडयामास देहं लङ्केश्वरो भृशम् । | ||||||
| 87 | 7.22p.3.40cरथं चाश्वयुजं क्षिप्रं बभञ्ज च महाबलः ॥ ४० ॥ | ||||||
| 88 | 7.22p.3.41aविरथः स रथं प्राप्य शक्तिं घण्टाट्टहासिनीम् । | ||||||
| 89 | 7.22p.3.41bमान्धाता विप्रचिक्षेप तां बलाद्रावणं प्रति ॥ ४१ ॥ | ||||||
| 90 | 7.22p.3.42aमरीचिमिव चार्कस्य चित्रभानोः शिखामिव । | ||||||
| 91 | 7.22p.3.42bदीप्यन्तीं रुचिराभासं मान्धातृकरनिस्सृताम् ॥ ४२ ॥ | ||||||
| 92 | 7.22p.3.43aतामापतन्तीं शूलेन पौलस्त्यो रजनीचरः । | ||||||
| 93 | 7.22p.3.43bददाह शक्तिं लङ्केशः पतङ्गभिव पावकः ॥ ४३ ॥ | ||||||
| 94 | 7.22p.3.44aयमदत्तं तु नाराचं निकृष्याथ दशाननः । | ||||||
| 95 | 7.22p.3.44bपातयामास वेगेन स तेनाभिहतो भृशम् ॥ ४४ ॥ | ||||||
| 96 | 7.22p.3.45aमूर्च्छितं नृपतिं दृष्ट्वा प्रहृष्टास्ते निशाचराः । | ||||||
| 97 | 7.22p.3.45bचुक्रुशुः सिंहनादांश्च क्ष्वेलन्तश्च निशाचराः ॥ ४५ ॥ | ||||||
| 98 | 7.22p.3.46aलब्धसंज्ञो मुहूर्तेन ह्ययोध्याधिपतिस्तदा । | ||||||
| 99 | 7.22p.3.46bतं दृष्ट्वा शत्रुभिः शत्रुं पूज्यमानं मुदान्वितैः ॥ ४६ ॥ | ||||||
| 100 | 7.22p.3.47aजातकोपो दुराधर्षश्चन्द्रार्कसदृशद्युतिः । | ||||||
| 101 | 7.22p.3.47bमहता शरवर्षेण पीडयन्त्राक्षसं बलम् ॥ ४७ ॥ | ||||||
| 102 | 7.22p.3.48aचापस्य च निनादेन तस्य बाणरवेण च । | ||||||
| 103 | 7.22p.3.48bसंचचाल ततः सैन्यमुद्भूत इव सागरः ॥ ४८ ॥ | ||||||
| 104 | 7.22p.3.49तद्युद्धमभवद्धोरं नरराक्षससंकुलम् ॥ ४९ ॥ | ||||||
| 105 | 7.22p.3.50aक्रुधाविष्टौ महात्मानौ नरराक्षससत्तमौ । | ||||||
| 106 | 7.22p.3.50bकार्मुकासिधरौ वीरौ शरासनगतौ तथा ॥ ५० ॥ | ||||||
| 107 | 7.22p.3.51aमान्धाता रावणं चैव राक्षसश्चैव तं नृपम् । | ||||||
| 108 | 7.22p.3.51bक्रोधेन महताऽऽविष्टौ शरवर्षं ववर्षतुः ॥ ५१ ॥ | ||||||
| 109 | 7.22p.3.52तौ परस्परसंक्षोभात्प्रहारैर्जर्जरीकृतौ ॥ ५२ ॥ | ||||||
| 110 | 7.22p.3.53aरावणो रौद्रमस्त्रं तु प्रायुङ्ग स महाबलः । | ||||||
| 111 | 7.22p.3.53bआग्नेयेन स मान्धाता तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ॥ ५३ ॥ | ||||||
| 112 | 7.22p.3.54गान्धर्वेण दशग्रीवो वारुणेन स राजराट् ॥ ५४ ॥ | ||||||
| 113 | 7.22p.3.55aगृहीत्वा स तु ब्रह्मास्त्रं सर्वभूतभयावहम् । | ||||||
| 114 | 7.22p.3.55bतोलयामास मान्धाता दिव्यं पाशुपतं महत् ॥ ५५ ॥ | ||||||
| 115 | 7.22p.3.56aतदस्त्रं घोररूपं तु त्रैलोक्यभयवर्धनम् । | ||||||
| 116 | 7.22p.3.56bदृष्ट्वा त्रस्तानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । | ||||||
| 117 | 7.22p.3.56cवरदानात्तु रुद्रस्य तपसाऽधिगतं महत् ॥ ५६ ॥ | ||||||
| 118 | 7.22p.3.57aततः प्रकम्पितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । | ||||||
| 119 | 7.22p.3.57bदेवाः प्रकम्पिताः सर्वे लयं नागाश्च मेनिरे ॥ ५७ ॥ | ||||||
| 120 | 7.22p.3.58aअथ तौ मुनिशार्दूलौ ध्यानयोगादपश्यताम् । | ||||||
| 121 | 7.22p.3.58bपुलस्त्यो गालवश्चैव वारयामासतुर्नृपम् । | ||||||
| 122 | 7.22p.3.58cउपलब्धैश्च विविधैर्वाक्यै राक्षससत्तमम् ॥ ५८ ॥ | ||||||
| 123 | 7.22p.3.59aतौ तु कृत्वा परां प्रीतिं नरराक्षसयोस्तदा । | ||||||
| 124 | 7.22p.3.59bसंप्रस्थितौ तु तौ हृष्टौ पथा येनैव चागतौ ॥ ५९ ॥ |