रामलक्ष्मणविषयकसीताशोकवर्णनम्. Built from structured/verses.jsonl. Rows are monotone-aligned half-verse/pāda-like units split at । and ॥, so verse-number boundary differences can appear as inserted or shifted line rows.
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gor-hi 48 lines
crit 42 lines
gr 49 lines
dr-mula 44 lines
| # | gor-kn | gor-hi | crit | gr | dr-mula | gr-iitk | iitk |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 1 | 6.47.1aतस्मिन् प्रविष्टे लङ्कायां कृतार्थे रावणात्मजे । | 6.37.1aप्रतिप्रविष्टे लङ्कां तु कृतार्थे रावणात्मजे । | 6.47.1aप्रतिप्रविष्टे लङ्कां तु कृतार्थे रावणात्मजे । | 6.47.1aप्रतिप्रविष्टे लङ्कां तु कृतार्थे रावणात्मजे। | |||
| 2 | 6.47.1bराघवं परिवार्याथ ररक्षुर्वानरर्षभाः ॥ १ ॥ | 6.37.1bराघवं परिवार्यार्ता ररक्षुर्वानरर्षभाः ॥6.37.1॥ | 6.47.1bराघवं परिवार्यार्ता ररक्षुर्वानरर्षभाः ॥ १ ॥ | 6.47.1bराघवं परिवार्यार्ता ररक्षुर्वानरर्षभाः ॥ 6.47.1 ॥ | |||
| 3 | 6.47.2aहनुमानङ्गदो नीलः सुषेणः कुमुदो नलः । | 6.37.2aहनूमानङ्गदो नीलः सुषेणः कुमुदो नलः । | 6.47.2aहनुमानङ्गदो नीलः सुषेणः कुमुदो नलः । | ||||
| 4 | 6.47.2bगजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ॥ २ ॥ | 6.37.2bगजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ॥6.37.2॥ | 6.47.2bगजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः । | 6.47.2aगजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः। | |||
| 5 | 6.47.3aजाम्बवानृषभः स्कन्धो रम्भः शतबलिः पृथुः । | 6.37.3aजाम्बवानृषभः सुन्दो रम्भः शतबलिः पृथुः । | 6.47.2cजाम्बवानृषभः स्कन्धो रम्भः शतबलिः पृथुः ॥ २ ॥ | 6.47.2bजाम्बवानृषभः स्कन्धो रम्भः शतवलिः पृथुः ॥ 6.47.2 ॥ | |||
| 6 | 6.47.3bव्यूढानीकाश्च यत्ताश्च द्रुमानादाय सर्वतः ॥ ३ ॥ | 6.37.3bव्यूढानीकाश्च यत्ताश्च द्रुमानादाय सर्वतः ॥6.37.3॥ | 6.47.3aव्यूढानीकाश्च यत्ताश्च द्रुमानादाय सर्वतः । | ||||
| 7 | 6.47.4aवीक्षमाणा दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च वानराः । | 6.37.4aवीक्षमाणा दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च वानराः । | 6.47.3bवीक्षमाणा दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च वानराः। | 6.47.3aवीक्षमाणा दिशः सर्वास्तिर्यगूर्ध्वं च वानराः। | |||
| 8 | 6.47.4bतृणेष्वपि च चेष्टत्सु राक्षसा इति मेनिरे ॥ ४ ॥ | 6.37.4bतृणेष्वपि च चेष्टत्सु राक्षसा इति मेनिरे ॥6.37.4॥ | 6.47.3cतृणेष्वपि च चेष्टत्सु राक्षसा इति मेनिरे ॥ ३ ॥ | 6.47.3bतृणेष्वपि च चेष्टत्सु राक्षसा इति मेनिरे ॥ 6.47.3 ॥ | |||
| 9 | 6.47.5aरावणश्चापि संहृष्टो विसृज्येन्द्रजितं सुतम् । | 6.37.5aरावणश्चापि संहृष्टो विसृज्येन्द्रजितं सुतम् । | 6.47.4aरावणश्चापि संहृष्टो विसृज्येन्द्रजितं सुतम् । | 6.47.4aरावणश्चापि संहृष्टो विसृज्येन्द्रजितं सुतम्। | |||
| 10 | 6.47.5bआजुहाव ततः सीतारक्षणी राक्षसीस्तदा ॥ ५ ॥ | 6.37.5bआजुहाव ततः सीता रक्षणी राक्षसीस्तदा ॥6.37.5॥ | 6.47.4bआजुहाव ततः सीतारक्षिणी राक्षसीस्तदा ॥ ४ ॥ | 6.47.4bआजुहाव ततः सीतारक्षिणी राक्षसीस्तदा ॥ 6.47.4 ॥ | |||
| 11 | 6.47.6aराक्षस्यस्त्रिजटा चापि शासनात् तमुपस्थिताः । | 6.37.6aराक्षस्यस्त्रिजटा चापि शासनात्तमुपस्थिताः । | 6.47.5aराक्षस्यस्त्रिजटा चैव शासनात्समुपस्थिताः । | 6.47.5राक्षस्यस्त्रिजटा चैव शासनात् समुपस्थिताः ॥ 6.47.5 ॥ | |||
| 12 | 6.47.6bता उवाच ततो हृष्टो राक्षसी राक्षसाधिपः ॥ ६ ॥ | 6.37.6bता उवाच ततो हृष्टो राक्षसी राक्षसेश्वरः ॥6.37.6॥ | 6.47.5bता उवाच ततो हृष्टो राक्षसी राक्षसाधिपः ॥ ५ ॥ | 6.47.6ता उवाच ततो हृष्टो राक्षसी राक्षसाधिपः ॥ 6.47.6 ॥ | |||
| 13 | 6.47.7aहताविन्द्रजिताख्यात वैदेह्या रामलक्ष्मणौ । | 6.37.7aहताविन्द्रजिताख्यात वैदेह्या रामलक्ष्मणौ । | 6.47.6aहताविन्द्रजिताऽऽख्यात वैदेह्या रामलक्ष्मणौ । | 6.47.7aहताविन्द्रजिताऽऽख्यात वैदेह्या रामलक्ष्मणौ। | |||
| 14 | 6.47.7bपुष्पकं तत्समारोप्य दर्शयध्वं रणे हतौ ॥ ७ ॥ | 6.37.7bपुष्पकं च समारोप्य दर्शयध्वं हतौ रणे ॥6.37.7॥ | 6.47.6bपुष्पकं च समारोप्य दर्शयध्वं हतौ रणे ॥ ६ ॥ | 6.47.7bपुष्पकं च समारोप्य दर्शयध्वं हतौ रणे ॥ 6.47.7 ॥ | |||
| 15 | 6.47.8aयदाश्रयादवष्टब्धा नेयं मामुपतिष्ठते । | 6.37.8aयदाश्रयादवष्टब्धो नेयं मामुपतिष्ठति । | 6.47.7aयदाश्रयादवष्टब्धा नेयं मामुपतिष्ठति । | 6.47.8aयदाश्रयादवष्टब्धा नेयं मामुपतिष्ठति। | |||
| 16 | 6.47.8bसोऽस्या भर्ता सह भ्रात्रा निहतो रणमूर्धनि ॥ ८ ॥ | 6.37.8bसोऽस्या भर्ता सह भ्रात्रा निरस्तो रणमूर्धनि ॥6.37.8॥ | 6.47.7bसोस्या भर्ता सह भ्रात्रा निरस्तो रणमूर्धनि ॥ ७ ॥ | 6.47.8bसोऽस्या भर्त्ता सह भ्रात्रा निरस्तो रणमूर्धनि ॥ 6.47.8 ॥ | |||
| 17 | 6.47.9aनिर्विशङ्का निरुद्विग्ना निरपेक्षा च मैथिली । | 6.37.9aनिर्विशङ्का निरुद्विग्ना निरपेक्षा च मैथिली । | 6.47.8aनिर्विशङ्का निरूद्विग्ना निरपेक्षा च मैथिली । | 6.47.9aनिर्विशङ्का निरुद्विग्ना निरपेक्षा च मैथिली। | |||
| 18 | 6.47.9bमामुपस्थास्यते सीता सर्वाभरणभूषिता ॥ ९ ॥ | 6.37.9bमामुपस्थास्यते सीता सर्वाभरणभूषिता ॥6.37.9॥ | 6.47.8bमामुपस्थास्यते सीता सर्वाभरणभूषिता ॥ ८ ॥ | 6.47.9bमामुपस्थास्यते सीता सर्वाभरणभूषिता ॥ 6.47.9 ॥ | |||
| 19 | 6.47.10aअद्य कालवशं प्राप्तं रणे रामं सलक्ष्मणम् । | 6.37.10aअद्य कालवशं प्राप्तं रणे रामं सलक्ष्मणम् । | #9aअद्य कालवशं प्राप्तं रणे रामं सलक्ष्मणम् । | ||||
| 20 | 6.47.10bअवेक्ष्य विनिवृत्ता सा चान्यां गतिमपश्यती ॥ १० ॥ | 6.37.10bअवेक्ष्य विनिवृत्ताशा नान्यां गतिमपश्यती ॥6.37.10॥ | #9bअवेक्ष्य विनिवृत्ताशा चान्यां गतिमपश्यती ॥ | 6.47.10aअवेक्ष्य विनिवृत्ताशा चान्यां गतिमपश्यती। | |||
| 21 | 6.47.11aअनपेक्षा विशालाक्षी मामुपस्थास्यते स्वयम् । | 6.47.9निरपेक्षा विशालाक्षी मामुपस्थास्यते स्वयम् ॥ ९ ॥ | 6.47.10bनिरपेक्षा विशालाक्षी मामुपस्थास्यते स्वयम् ॥ 6.47.10 ॥ | ||||
| 22 | 6.47.11bतस्य तद् वचनं श्रुत्वा रावणस्य दुरात्मनः ॥ ११ ॥ | 6.37.11aतस्य तद्वचनं श्रुत्वा रावणस्य दुरात्मनः । | 6.47.10aतस्य तद्वचनं श्रुत्वा रावणस्य दुरात्मनः । | 6.47.11aतस्य तद्वचनं च श्रुत्वा रावणस्य दुरात्मनः। | |||
| 23 | 6.47.12aराक्षस्यस्तास्तथेत्युक्त्वा जग्मुर्वै यत्र पुष्पकम् । | 6.37.11bराक्षस्यस्तास्तथेत्युक्त्वा प्रजग्मुर्यत्र पुष्पकम् ॥6.37.11॥ | 6.47.10bराक्षस्यस्तास्तथेत्युक्त्वा जग्मुर्वै यत्र पुष्पकम् ॥ १० ॥ | 6.47.11bराक्षस्यस्तास्तथेत्युक्त्वा जग्मुर्वै यत्र पुष्पकम् ॥ 6.47.11 ॥ | |||
| 24 | 6.47.12bततः पुष्पकमादाय राक्षस्यो रावणाज्ञया ॥ १२ ॥ | 6.37.12aततः पुष्पकमादय राक्षस्यो रावणाज्ञया । | 6.47.11aततः पुष्पकमादाय राक्षस्यो रावणाज्ञया । | 6.47.12aततः पुष्पकमादाय राक्षस्यो रावणाज्ञया। | |||
| 25 | 6.47.13aअशोकवनिकास्थां तां मैथिलीं समुपानयन् । | 6.37.12bअशोकवनिकास्थां तां मैथिलीं समुपानयन् ॥6.37.12॥ | 6.47.11bअशोकवनिकास्थां तां मैथिलीं समुपानयन् ॥ ११ ॥ | 6.47.12bअशोकवनिकास्थां तां मैथिलीं समुपानयन् ॥ 6.47.12 ॥ | |||
| 26 | 6.47.13bतामादाय तु राक्षस्यो भर्तृशोकपराजिताम् ॥ १३ ॥ | 6.37.13aतामादाय तु राक्षस्यो भर्तृशोकपरायणाम् । | 6.47.12aतामादाय तु राक्षस्यो भर्तृशोकपराजिताम् । | 6.47.13aतामादाय तु राक्षस्यो भर्तृशोकपराजिताम्। | |||
| 27 | 6.47.14aसीतामारोपयामासुर्विमानं पुष्पकं तदा । | 6.37.13bसीतामारोपयामासुर्विमानं पुष्पकं तदा ॥6.37.13॥ | 6.47.12bसीतामारोपयामासुर्विमानं पुष्पकं तदा ॥ १२ ॥ | 6.47.13bसीतामारोपयामासुर्विमानं पुष्पकं तदा ॥ 6.47.13 ॥ | |||
| 28 | 6.47.14bततः पुष्पकमारोप्य सीतां त्रिजटया सह ॥ १४ ॥ | 6.37.14aततः पुष्पकमारोप्य सीतां त्रिजटया सह । | 6.47.13aततः पुष्पकमारोप्य सीतां त्रिजटया सह । | 6.47.14aततः पुष्पकमारोप्य सीतां त्रिजटया सह। | |||
| 29 | 6.37.14bरावणोऽकारयल्लङ्कां पताकाध्वजमालिनीम् ॥6.37.14॥ | ||||||
| 30 | 6.47.15aजग्मुर्दर्शयितुं तस्यै राक्षस्यो रामलक्ष्मणौ । | 6.47.13bजग्मुर्दर्शयितुं तस्यै राक्षस्यो रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥ | 6.47.14bजग्मुर्दर्शयितुं तस्यै राक्षस्यो रामलक्ष्मणौ ॥ 6.47.14 ॥ | ||||
| 31 | 6.47.15bरावणश्चारयामास पताकाध्वजमालिनीम् ॥ १५ ॥ | 6.47.14aरावणोकारयल्लङ्कां पताकाध्वजमालिनीम् । | |||||
| 32 | 6.47.16aप्राघोषयत हृष्टश्च लङ्कायां राक्षसेश्वरः । | 6.37.15aप्राघोषयत हृष्टश्च लङ्कायां राक्षसेश्वरः । | 6.47.14bप्राघोषयत हृष्टश्च लङ्कायां राक्षसेश्वरः । | 6.47.15aप्राघोषयत हृष्टश्च लङ्कायां राक्षसेश्वरः। | |||
| 33 | 6.47.16bराघवो लक्ष्मणश्चैव हताविन्द्रजिता रणे ॥ १६ ॥ | 6.37.15bराघवो लक्ष्मणश्चैव हताविन्द्रजिता रणे ॥6.37.15॥ | 6.47.14cराघवो लक्ष्मणश्चैव हताविन्द्रजिता रणे ॥ १४ ॥ | 6.47.15bराघवो लक्ष्मणश्चैव हताविन्द्रजिता रणे ॥ 6.47.15 ॥ | |||
| 34 | 6.47.17aविमानेनापि गत्वा तु सीता त्रिजटया सह । | 6.37.16aविमानेनापि सीता तु गत्वा त्रिजटया सह । | 6.47.15aविमानेनापि सीता तु गत्वा त्रिजटया सह । | 6.47.16aविमानेनापि सीता तु गत्वा त्रिजटया सह। | |||
| 35 | 6.47.17bददर्श वानराणां तु सर्वं सैन्यं निपातितम् ॥ १७ ॥ | 6.37.16bददर्श वानराणां तु सर्वं सिन्यं निपातितम् ॥6.37.16॥ | 6.47.15bददर्श वानराणां तु सर्व सैन्यं निपातितम् ॥ १५ ॥ | 6.47.16bददर्श वानराणां तु सर्वं सैन्यं निपातितम् ॥ 6.47.16 ॥ | |||
| 36 | 6.47.18aप्रहृष्टमनसश्चापि ददर्श पिशिताशनान् । | 6.37.17aप्रहृष्टमनसश्चापि ददर्श पिशिताशनान् । | 6.47.16aप्रहृष्टमनसश्चापि ददर्श पिशिताशनान् । | 6.47.17aप्रहृष्टमनसश्चापि ददर्श पिशिताशनान्। | |||
| 37 | 6.47.18bवानरांश्चातिदुःखार्तान् रामलक्ष्मणपार्श्वतः ॥ १८ ॥ | 6.37.17bवानरांश्चापि दुःखार्तान्रामलक्ष्मणपार्श्वतः ॥6.37.17॥ | 6.47.16bवानरांश्चापि दुःखार्तान्रामलक्ष्मणपार्श्वतः ॥ १६ ॥ | 6.47.17bवानरांश्चापि दुःखार्तान् रामलक्ष्मणपार्श्वतः ॥ 6.47.17 ॥ | |||
| 38 | 6.47.19aततः सीता ददर्शोभौ शयानौ शरतल्पगौ । | 6.37.18aततः सीता ददर्शोभौ शयानौ शततल्पयोः । | 6.47.17aततः सीता ददर्शोभौ शयानौ शरतल्पयोः । | 6.47.18aततः सीता ददर्शोभौ शयानौ शरतल्पयोः। | |||
| 39 | 6.47.19bलक्ष्मणं चैव रामं च विसञ्ज्ञौ शरपीडितौ ॥ १९ ॥ | 6.37.18bलक्ष्मणं चैव रामं च विसंज्ञौ शरपीडितौ ॥6.37.18॥ | 6.47.17bलक्ष्मणं चापि रामं च विसंज्ञौ शरपीडितौ ॥ १७ ॥ | 6.47.18bलक्ष्मणं चापि रामं च विसञ्ज्ञौ शरपीडितौ ॥ 6.47.18 ॥ | |||
| 40 | 6.47.20aविध्वस्तकवचौ वीरौ विप्रविद्धशरासनौ । | 6.37.19aविध्वस्तकवचौ वीरौ विप्रविद्धशरासनौ । | 6.47.18aविध्वस्तकवचौ वीरौ विप्रविद्धरासनौ । | 6.47.19aविध्वस्तकवचौ वीरौ विप्रविद्धशरासनौ। | |||
| 41 | 6.47.20bसायकैश्छिन्नसर्वाङ्गौ शरस्तम्बमयौ क्षितौ ॥ २० ॥ | 6.37.19bसायकैश्छिन्नसर्वाङ्गौ शरस्तम्भमयौ क्षितौ ॥6.37.19॥ | 6.47.18bसायकैश्छिन्नसर्वाङ्गौ शरस्तम्बमयौ क्षितौ ॥ १८ ॥ | 6.47.19bसायकैश्छिन्नसर्वाङ्गौ शरस्तम्बमयौ क्षितौ ॥ 6.47.19 ॥ | |||
| 42 | 6.47.21aतौ दृष्ट्वा भ्रातरौ तत्र प्रवीरौ पुरुषर्षभौ । | 6.37.20aतौ दृष्ट्वा भ्रातरौ तत्र वीरौ सा पुरुषर्षभौ । | 6.47.19aतौ दृष्ट्वा भ्रातरौ तत्र वीरौ सा पुरुषर्षभौ । | 6.47.20aतौ दृष्ट्वा भ्रातरौ तत्र वीरौ सा पुरुषर्षभौ। | |||
| 43 | 6.47.21bशयानौ पुण्डरीकाक्षौ कुमाराविव पावकी ॥ २१ ॥ | 6.47.19bशयानौ पुण्डरीकाक्षौ कुमाराविव पावकी ॥ १९ ॥ | 6.47.20bशयानौ पुण्डरीकाक्षौ कुमाराविव पावकी ॥ 6.47.20 ॥ | ||||
| 44 | 6.47.22aशरतल्पगतौ वीरौ तथाभूतौ नरर्षभौ । | 6.47.20aशरतल्पगतौ वीरौ तथाभूतौ नरर्षभौ । | 6.47.21aशरतल्पगतौ वीरौ तथाभूतौ नरर्षभौ। | ||||
| 45 | 6.47.22bदुःखार्ता करुणं सीता सुभृशं विललाप ह ॥ २२ ॥ | 6.37.20bदुःखार्ता सुभृशं सीता करुणं विललाप ह ॥6.37.20॥ | 6.47.20bदुःखार्ता सुभृशं सीता सुचिरं विललाप ह ॥ २० ॥ | 6.47.21bदुःखार्ता सुभृशं सीता सुचिरं विललाप ह ॥ 6.47.21 ॥ | |||
| 46 | 6.47.23aभर्तारमनवद्याङ्गी लक्ष्मणं चासितेक्षणा । | 6.47.21aभर्तारमनवद्याङ्गी लक्ष्मणं चासितेक्षणा । | 6.47.22aभर्तारमनवद्याङ्गी लक्ष्मणं चासितेक्षणा। | ||||
| 47 | 6.47.23bप्रेक्ष्य पांसुषु चेष्टन्तौ रुरोद जनकात्मजा ॥ २३ ॥ | 6.47.21bप्रेक्ष्य पांसुषु वेष्टन्तौ रुरोद जनकात्मजा ॥ २१ ॥ | 6.47.22bप्रेक्ष्य पांसुषु वेष्टन्तौ रुरोद जनकात्मजा ॥ 6.47.22 ॥ | ||||
| 48 | 6.47.24aसबाष्पशोकाभिहता समीक्ष्य तौ भ्रातरौ देवसुतप्रभावौ । | 6.37.21aसा बाष्पशोकाभिहता समीक्ष्य तौ भ्रातरौ देवसमप्रभावौ । | 6.47.22aसा बाष्पशोकाभिहता समीक्ष्य तौ भ्रातरौ देवसमप्रभावौ । | 6.47.23aसा बाष्पशोकाभिहता समीक्ष्य तौ भ्रातरौ देवसमप्रभावौ। | |||
| 49 | 6.47.24bवितर्कयन्ती निधनं तयोः सा दुःखान्विता वाक्यमिदं जगाद ॥ २४ ॥ | 6.37.21bवितर्कयन्ती निधनं तयोः सा दुःखान्विता वाक्यमिदं जगाद ॥6.37.21॥ | 6.47.22bवितर्कयन्ती निधनं तयोः सा दुःखान्विता वाक्यमिदं जगाद ॥ २२ ॥ | 6.47.23bवितर्कयन्ती निधनं तयोः सा दुःखान्विता वाक्यमिदं जगाद ॥ 6.47.23 ॥ | |||
| 50 | 6.47.47इति श्रीगोविन्दराजविरचिते श्रीमद्रामायणभूषणे रत्नकिरीटाख्याने युद्धकाण्डव्याख्याने सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४७ ॥ |